Monday, November 17, 2014

पिछला पतझड़

एक हैरानी सी होती है कभी 
पिछले पतझड़ शाख टूटी थी जब 
लगा था जैसे पेड़ मुरझा जाएगा अब 
लगा था जैसे …  छाओं का गिलाफ उतर गया है , 
और तपती ज़मीन की आदत डालनी पड़ेगी अब.…

दिन, महीने, मौसम, तब्दील हुए 
उस पेड़ पर फूल तो ना आये कोई 
पर जड़ मज़बूत है उस पेड़ की 
बांधे रखा, सींचे रखा और तरबियत की उस पेड़ की 

एक हैरानी सी होती है कभी,
पिछले पतझड़ लगा था जैसे कोई हरियाली नहीं फूटेगी अब
पर अब लगता है जैसे कुछ फलों की महक सी है 

पतझड़ तो और भी आएंगे अभी, 
ज़मीन में तपन तो अब भी बाकी है 
लेकिन ये जड़ अपनी मिट्टी से कुछ ऐसी जुडी है अब 
लगता है इस पेड़ ने कई सावन देखने है अभी 

Friday, January 24, 2014

Portraits of Yesterday ..

And while she gazed into the vast expanse, soaking in the dusk before night falls, 
Unaware of the sand caught between her toes;  oblivious to the waves hitting her hard
She gazed and found portraits of yesterday. 

First auburn, then crimson, a little azure and finally black, 
even the colors of the skies chronicled a narrative;
And while she formed patterns of the clouds; oblivious to the changing contours every second,
She gazed and found portraits of yesterday. 

The moon glowed in pristine beauty, 
the waves lashed higher; as if to keep the rain-clouds away;
And while she carefully built her castle; oblivious of the waves and rain now colluding.
She gazed and found portraits of yesterday. 

By now  the heavens were overcast;
when a strike of lightening dulled the pristine moon;
And while she hurriedly collected her shells; oblivious of the sand she had gathered along;
She looked back and realised....

She had got along those portraits of yesterday. 

Wednesday, December 25, 2013

कई बार यूँ होता है.…

कई  बार, 
शोर तो बहुत होता है आस पास , पर सुनाई सिर्फ एक चुप्पी देती है 
चहलकदमी तो होती है चारों ओर , पर नज़र सिर्फ  उस एक  आहट पे होती है 

कई बार,
दिन हफ़्तों में और हफ्ते महीनों में तब्दील होते हैं,
पर सोच उस एक पल पे ही रुक जाती है, 
कहकशियों का माहौल तो  बना ही रहता है, 
पर जुबां बस उस अनकही पे ही अटक जाती है.

कई  बार,
आँखें मूँद लेते हैं;  नींद भी पूरी होती है; बस पलकों के पीछे इक सपना छिप के रह जाता है 
किस्से-कहानियों में जैसे कभी ज़िन्दगी ढूंढा करते थे, 
अब हर लम्हा जैसे कोई किस्सा ही बन कर रह जाता है … 

कई बार यूँ होता है.…
कि खुद का वजूद, खुद में मुकम्मल तो लगता है...
पर ज़हन में ये एहसास कहीं न कहीं दस्तक देता है 

कि इंसा अपना आधा-अधूरा, 
दूसरे  से ही पूरा करता है.………… 

Wednesday, October 9, 2013

It is what it is !

Is silence a semblance of order; or clatter that of chaos,
Is routine an outcome of stability;
Is change always an unexpected surprise !

Beneath the silence, there could be whispers of confusion,
Simmering uncertainties, rumbling ruses, some stirring doubts and illusions...
The clatter could just be innocuous chatter,
A veritable bedlam of some trivial natter.

Routine might just be an escape from the unknown;
Monotony... just a facade for the tempest within...
Change could just be a deferred amendment; a long known divergence that was always meant !

Maybe when chaos itself blends into silence;
And when no more surprises unsettle the routine,
Its time to just let off and let go;

Time to tell yourself,
It is what is is .. and this is all there is to know !

Thursday, October 3, 2013

सब ही तो उड़ रहे हैं यहाँ …….

चलना, दौड़ना और  उड़ने की ख्वाइश रखना,
ना रुकना, ना मुड़ना, ना सांस भरने को थमना 
सही तो है, इसमें हैरानी क्या है !
बस एक उम्र ही तो मिली है। … 
अगर रुक ही गए तो फिर मनमानी क्या है !

मैं चली, दौड़ी, उड़ान भरने की पूरी तैयारी,
पर ये आसमां ज़रा अजनबी सा लगता है 
दौड़ते-दौड़ते शायद रस्ते का हिसाब भूल गयी मैं ,
ये नज़ारा नया तो है, पर कुछ पराया सा लगता है.…

सब उड़ तो रहे हैं यहाँ, सुनहरे पंख लगाए,
अपने ही इन्द्रधनुष के रंगों में रंगे ……
अपने ही बादलों में गुम से हैं सब, सब ही तो उड़ रहे हैं यहाँ ……. 

पर ये आसमां ज़रा अजनबी सा लगता है, 
हर बादल पे एक साइन्पोस्ट सा लगा है,
ऊँचाई का माप लिखा है हर बादल पे.……. 
ये नज़ारा कुछ पेचीदा सा लगता है !

सब उड़ तो रहे हैं यहाँ, दौड़ते-दौड़ते अब कूदने भी लगे हैं,
मैं तो सांस भरने को आई थी, लगता है उसका फैशन पूरा हो गया है अब,
सब ही तो उड़ रहे हैं यहाँ ………. 

हर बादल के ऊपर एक और बादल है, सुना है इस आसमां के आगे एक और जहाँ है,
पर धुप वहां  भी ऐसी ही खिलती है,
कहते हैं बारिश, बहार, पत्तझड़, सब इसी मिजाज़ में रहते हैं 
हाँ, सुना है वहां जगह बहुत खाली है,
अपनी ही आवाज़ की गूँज भी सुन सकते हैं …… 

पर मैं तो सांस भरने को आई थी यहाँ, 
कुछ पुरानी, कुछ नयी, कुछ अनसुनी आवाजें सुनने को आई थी ……. 
मैं उड़ने या कूदने नहीं, बैठके अपने आसमान को सहेजने, समेटने, सवारने आई थी यहाँ !

पर सब ही तो उड़ रहे हैं यहाँ ………. 

Saturday, August 3, 2013

वक्त थमता तो नहीं,
गुज़र ही जाता है 
पर वक्त का एहसास तो है,
वो मेरे पास ही रह गया है 

उफनती लहरें रूकती तो नहीं, 
समेट लेती हैं सब अपने आँचल में 
कुछ रेत मैंने मुट्ठी में  भर ली थी
वो मेरे पास ही रह गयी है 

रात का डर भी नींद के साथ टूट ही जाता है 
सुबह के उजाले की दस्तक सुन भाग खड़ा होता है  
पलक के एक कोने में एक ख्वाब रखा था 
वो मेरे पास ही रह गया  है  

सुने सुनाये किस्से कहानियाँ का रंग 
बरसों की परतों में रखे फीका सा पड़  गया है 
एक जो  दास्ताँ अनकही सी बची थी 
बस, वो मेरे पास रह गयी है ...... 


Thursday, July 18, 2013

Unnerving it is....or is it liberating?

Just as the clasp loosened its grip,
The binding thread is suddenly snipped;
Just as you get ready to walk the road alone,
The push on the back is suddenly gone
Unnerving it is....or is it liberating?

Just when you though you made it to the end,
The zenith was reached, there’s no further ascend;
Just when you sat to savour the stillness around,
Another echo was heard, there was still some sound
Unnerving it is....or is it liberating?

And finally when the sun shone upon brightly,
You gathered yourself and jumped about sprightly;
Just then the clouds cast upon a shadow;
The breeze followed, the raindrops splashed on the window
Unnerving it is.....or is it liberating?